Saturday, December 19, 2009

भारत और इंडिया में इतना फर्क क्यों ?


रमेश का दिल्ली में यह १५ वा साल है । १९९५ में मेट्रिक करने के बाद वे सीधे दिल्ली आगये थे । दिल्ली आने के पीछे उनकी वजह सिर्फ यह थी की वे अपने देसी भाषा में यहाँ संवाद कर सकते थे । नौकरी के नाम पर उन्हें किसी लाला की दूकान में १२०० रूपये की नौकरी मिली और चल पड़ी उनकी जिन्दगी .सस्ता खाना ,बाहरी इलाके में सस्ता आवास ,बसों का सस्ता किराया और जल्द ही उनकी गाडी पटरी पर सरपट दौड़ने लगी थी .उत्तर भारत के गाँव से बाहर निकले हजारों लोगों को दिल्ली सबसे उपयुक्त शहर लगने लगा था । पैसा भले ही वो कम कमाता था लेकिन उसे यहाँ गुजरा हो जाता था । आज रमेश मंडल को आठ हजार रूपये मिल रहे है लेकिन उनका गुजरा चलना मुस्किल हो गया है .आज दिल्ली उन्हें रास नहीं आरही है ,आज वर्षों बाद वह अपना गाँव लौटना चाहता है । यानि दिल्ली में गरीबों का रहना अब लोहे के चने चबाने जैसे बात है .एक आम आदमी सिर्फ बस के किराये में २५०० से ३००० रूपये तक खर्च करता है ,खाने पिने की चीजों की आसमान छूती महगाई उसे पहले से ही जीने का हक छीन लिया है । शहर में रहने वाले तकरीबन ७०फ़िसद लोगों की यही कहानी है यानी देसी भाषा भाषी के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है । लेकिन सरकार की माने तो वे गरीब नहीं है । यहाँ २० रूपये से कम कमाने वाले लोग गरीब है .यानि शहरो में १०० रूपये से लेकर १००००० रूपये कमाने वाले एक ही श्रेणी में आते है । ये सभी गरीबी रेखा से ऊपर है । जबकि सच यह है की भारत में रहने वाला हर व्यक्ति गरीब है जबकि इंडिया में रहने वाले हर व्यक्ति आमिर । अगर इस भारत की आवादी ६० करोड़ से ज्यादा है तो इंडिया में रहने वाले ऐसे करोडो लोग है जिनकी तादाद दुनिया के किसी देशो से ज्यादा है ।
इस तरह भाषा के आधार पर यह देश दो अलग अलग हिस्सों में बटा है देसी बोलने बाले भारत के बाशिंदे है जबकि अंग्रजी बोलने वाले लोग इंडिया में रहते है । गरीबी का पैमान यहाँ सिर्फ भाषा है । सरकारी कामकाज से लेकर कारोबार तक की भाषा यहाँ सिर्फ अंग्रेजी है फिर क्षेत्रीय भाषा भाषी के बारे में सोचा जा सकता है । पिछले वर्षों में गाँव से लेकर शहरों तक तथाकथित अंग्रेजी स्कूलों की बाढ़ इस चिंता को दर्शाती है । हर माँ बाप अपने बच्चे को इंडिया का नागरिक बनाना चाहता है उसे भारत की भीड़ से अलग करना चाहता है .और इसके लिए उन्हें अंग्रेजी सबसे उपयुक्त पासपोर्ट लगता है । हिंदी राष्ट्र की भाषा है लेकिन सम्मान की भाषा गौरब की भाषा ,नौकरी की भाषा ,तरकी की भाषा अंग्रेजी हो गयी है ।
बिहार से आने वाले बीरबल झा दिल्ली में ब्रिटिश लिंगुआ के नाम से इंस्टिट्यूट चला रहे है । बिहार के होने के बावजूद वे बिहारी नहीं है क्योंकि उनकी भाषा देसी नहीं है । अब बीरबल झा जैसे लोग बिहार से बेलोंग्स करते है । अब वे इंडिया के नागरिक है ,अब उनके बच्चे शहरों के बड़े बड़े इंग्लिश स्कूल में पढ़ते है । यानि एक भाषा के जरिये इतनी आसानी से जेनरेसियन चेंज दुनिया के किसी मुल्क में संभव नहीं है .यहाँ तरक्की की कुंजी सिर्फ अंग्रेजी के पास है । बिहार के एक बहुत ही पिछड़े हुए गाँव सिजौल से आने वाले झा की कहानी अमूमन हर भारत में रहने वाले लोगों जैसी ही है । प्राइमरी स्कूल की तालीम के लिए यहाँ बंच्चो को कम से कम ४ किलो मीटर का सफ़र तय करना पड़ता था । बीरबल झा बताते है पढाई लिखाई की ओउर माता पिता की जागरूकता इस बात से समझी जा सकती है की कभी स्कूल में शिक्षक ने परीक्षा के नाम पर ५० पैसे की मांग कर दी तो आधे से ज्यादा बच्चे स्कूलों से गायब हो जाते थे । लेकिन एक दौर ऐसा भी आया जब इन्ही गाँव से बड़ी तादाद में विद्यार्थी उची शिक्षा में अब्बल नजर आये । बीरबल झा ने गरीबी को काफी नजदीक से देखा था ,सपना देखना उसके फितरत में शामिल था .वह बहुत जल्दी भीड़ से अलग होना चाहता था । वह कवी बनाना चाहता था वह पत्रकार बनाना चाहता था .वह गरीबी से पल्ला छुड़ाना चाहता था । पढाई जारी रखने के लिए वह दिन रात मिहनत करता लेकिन सपना देखना उसने कभी नहीं छोड़ा ।
वर्षों बाद बीरबल झा के बारे में मैंने एक अख़बार में पढ़ा । चार छः बच्चों को लेकर उसने पटना में ब्रिटिश लिंगुआ नामसे एक इंस्टिट्यूट चलाना शुरू किया था । अख़बारों के जरिये पता चला बीरबल झा की लिंगुआ अब पुलिस से लेकर शिक्षकों तक को अंग्रेजी सिखा रही है । ब्रिटिश लिंगुआ कई राज्यों में अपनी सेवा दे रही है और कई राज्य सरकारे इस संस्था की सेवा अपने करमचारियों की क्षमता बढाने के लिए ले रही है ।
एक भाषा ने बीरबल को कॉरपोरेट का दर्जा दिया है तो एक भाषा की कीमत इतनी कम है की १५ साल दिल्ली में संघर्ष करने के वाबजूद रमेश को वापस गाँव जाने के लिए मजबूर कर रहा है । देश की सियासत रमेश जैसे लोग को भारत में रहने के लिए मजबूर कर रहा है जबकि अंग्रेजी की जोर पर बीरबल झा जैसे लोग सियासत के रंग को फीका कर रहा है । बिहार के सरकारी स्कूलों में जब भी कभी अंग्रेजी को अनिवार्ज्य करने की बात आती है सियासत तेज हो जाती है । सियासत करने वाले वही लोग है जो तथाकथित समतामूलक समाज का दावा करते है .वे पिछड़ों के लिए आरक्षण चाहते है लेकिन पिछडो को तालीम से मरहूम रखना चाहते है । आज का दौर नोव्लेज इकोनोमी का है । ग्लोबल विलेज की संरचना ने दुनिया की दुरी काफी कम कर दी है । इस हालत में बिहार को रमेश चाहिए या बीरबल यह सरकार को तय करना है ।


विनोद मिश्र